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शेर
बद की सोहबत में मत बैठो इस का है अंजाम बुरा
बद न बने तो बद कहलाए बद अच्छा बदनाम बुरा
इस्माइल मेरठी
नज़्म
वालिदा मरहूमा की याद में
ज़िंदगी की ओज-गाहों से उतर आते हैं हम
सोहबत-ए-मादर में तिफ़्ल-ए-सादा रह जाते हैं हम
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
सुकून-ए-मुस्तक़िल दिल बे-तमन्ना शैख़ की सोहबत
ये जन्नत है तो इस जन्नत से दोज़ख़ क्या बुरा होगा
हरी चंद अख़्तर
नज़्म
आज इक हर्फ़ को फिर ढूँडता फिरता है ख़याल
सोहबत-ए-यार में आग़ाज़-ए-तरब की सूरत
हर्फ़-ए-नफ़रत कोई शमशीर-ए-ग़ज़ब हो जैसे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मुफ़्लिसी
सोहबत में सारी रात जगाती है मुफ़्लिसी
वो तो ये समझे दिल में कि ढेला जो पाऊँगी
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
वाइ'ज़ से रह-ओ-रस्म रही रिंद से सोहबत
फ़र्क़ इन में कोई इतना ज़ियादा तो नहीं था










