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ग़ज़ल
है ख़याल-ए-हुस्न में हुस्न-ए-अमल का सा ख़याल
ख़ुल्द का इक दर है मेरी गोर के अंदर खुला
मिर्ज़ा ग़ालिब
नअत
इज़्ज़त से न मर जाएँ क्यों नाम-ए-मोहम्मद पर
हम ने किसी दिन यूँ भी दुनिया से तो जाना है
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
नअत
उम्मत में हूँ उन की कि जो हैं रहमत-ए-आलम
क्यों हश्र का डर हो मिरा क्या कोई नहीं है
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
नज़्म
गोरिस्तान-ए-शाही
क्या यही है इन शहंशाहों की अज़्मत का मआल
जिन की तदबीर-ए-जहाँबानी से डरता था ज़वाल
अल्लामा इक़बाल
नअत
न क्यों ऊँचा हो सारे अंबिया से मर्तबा उन का
सिफ़ारिश कर के जो उम्मत को अपनी बख्शवाते हों
शकील बदायूनी
नज़्म
हश्र की सुब्ह दरख़्शाँ हो मक़ाम-ए-महमूद
चाँद का नाम तिरे चाक-गरेबानों में
मुब्तदी ढूँडते हैं मस्जिद-ए-अक़्सा में इमाम
आदिल मंसूरी
ग़ज़ल
जगत सबहहा अमत बरहमुख अटक कहसवा ममन करन खा
दिवानी केनी तुमन सुरीजन न सुध की गर पर न बुध की झाला
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
दिल में जो तसव्वुर है तिरी ज़ुल्फ़-ए-रसा का
समझा हूँ इसे मैं तो 'अमल रद्द-ए-बला का














