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अम्मार इक़बाल

1986 | लाहौर, पाकिस्तान

ग़ज़ल 11

शेर 9

मैं ने चाहा था ज़ख़्म भर जाएँ

ज़ख़्म ही ज़ख़्म भर गए मुझ में

एक ही बात मुझ में अच्छी है

और मैं बस वही नहीं करता

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मैं ने तस्वीर फेंक दी है मगर

कील दीवार में गड़ी हुई है

उस ने नासूर कर लिया होगा

ज़ख़्म को शाएरी बनाते हुए

एक दरवेश को तिरी ख़ातिर

सारी बस्ती से इश्क़ हो गया है

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