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नज़्म
आख़िरी ख़त
शायद मिरी तुर्बत को भी ठुकरा के चलोगी
शायद मिरी बे-सूद वफ़ाओं पे हँसोगी
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ग़ज़ल
उसे अब के वफ़ाओं से गुज़र जाने की जल्दी थी
मगर इस बार मुझ को अपने घर जाने की जल्दी थी
राहत इंदौरी
नज़्म
तो बेहतर है यही
मैं भी नाकाम-ए-वफ़ा था तो भी महरूम-ए-मुराद
हम ये समझे थे कि दर्द-ए-मुश्तरक रास आ गया
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
वफ़ा क्या कर नहीं सकते हैं वो लेकिन नहीं करते
कहा क्या कर नहीं सकते हैं वो लेकिन नहीं करते










