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ग़ज़ल
क्या क़हर है वक़्फ़ा है अभी आने में उस के
और दम मिरा जाने में तवक़्क़ुफ़ नहीं करता
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
नज़्म
जुगनू
बस एक वक़्फ़ा-ए-तारीक, लम्हा-ए-शहला
समा में जुम्बिश-ए-मुबहम सी कुछ हुई फ़ौरन
फ़िराक़ गोरखपुरी
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शेर
सवाल करने के हौसले से जवाब देने के फ़ैसले तक
जो वक़्फ़ा-ए-सब्र आ गया था उसी की लज़्ज़त में आ बसा हूँ
अज़्म बहज़ाद
ग़ज़ल
ज़रा वक़्फ़ा से निकलेगा मगर निकलेगा चाँद आख़िर
कि सूरज भी तो मग़रिब में छुपा आहिस्ता आहिस्ता
अहमद नदीम क़ासमी
नज़्म
ग़ुबार-ए-ख़ातिर-ए-महफ़िल ठहर जाए
हमारी ख़ामुशी बस दिल से लब तक एक वक़्फ़ा है
ये तूफ़ाँ है जो पल भर बर-लब-ए-साहिल ठहर जाए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
मैं कल और आज में हाएल कोई नादीदा वक़्फ़ा हूँ
मिरे ख़्वाबों से नापा जा रहा है फ़ासला मेरा











