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नज़्म
ये ज़ालिम तीसरा पैग इक अक़ानीमी बिदायत है
उलूही हर्ज़ा-फ़रमाई का सिर्र-ए-तूर-ए-लुक्नत है
जौन एलिया
नज़्म
रबूद आँ तुर्क शीराज़ी दिल-ए-तबरेज़-ओ-काबुल रा
सबा करती है बू-ए-गुल से अपना हम-सफ़र पैदा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
क्या सुनाता है मुझे turk-o-arab की दास्ताँ
मुझ से कुछ पिन्हाँ नहीं इस्लामियों का सोज़-ओ-साज़
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जूँ तूँ रस्ता कट जाता है और बंदी-ख़ाना आता है
चल काम में अपने दिल को लगा यूँ कोई मुझे समझाता है
मीराजी
नज़्म
फिर पूछा उस ने कहिए ये है दिल का तूर क्या
इस के मुशाहिदे में है खुलता ज़ुहूर क्या
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
वो बालक है आज भी हैराँ मेला जूँ-का-तूँ है लगा
हैराँ है बाज़ार में चुप-चुप क्या क्या बिकता है सौदा
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
इक दिया जो बेचता है माँगता है शम-ए-तूर
इक ज़रा से संग-रेज़े की है क़ीमत कोह-ए-नूर
जोश मलीहाबादी
नज़्म
कभी मैं ज़ौक़-ए-तकल्लुम में तूर पर पहुँचा
छुपाया नूर-ए-अज़ले ज़ेर-ए-आस्तीं मैं ने