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नज़्म
ग़ुबार-ए-रहगुज़र हैं कीमिया पर नाज़ था जिन को
जबीनें ख़ाक पर रखते थे जो इक्सीर-गर निकले
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
रख़्त-ए-हस्ती ख़ाक-ए-ग़म की शो'ला-अफ़्शानी से है
सर्द ये आग इस लतीफ़ एहसास के पानी से है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जोश मलीहाबादी
नज़्म
रखते हैं जो 'अज़ीज़ उन्हें अपनी जाँ की तरह
मिलते हैं दस्त-ए-यास वो बर्ग-ए-ख़िज़ाँ की तरह
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
शब्नमिस्तान-ए-तजल्ली का फ़ुसूँ क्या कहिए
चाँद ने फेंक दिया रख़्त-ए-सफ़र आज की रात
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
अब इस बस्ती में रखते ही क़दम कुछ ऐसा लगता है
कि इस का ज़र्रा ज़र्रा पत्ता पत्ता कुछ नया सा है
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
नज़्म
हल्की टोपी सर पे रखते हैं तो चकराता है सर
और जूते की तरफ़ बढ़िए तो झुक जाता है सर