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नज़्म
मैं अपने शहर-ए-इल्म-ओ-फ़न का था इक नौजवाँ काहिन
मिरे तिल्मीज़-ए-इल्म-ओ-फ़न मिरे बाबा के थे हम-सिन
जौन एलिया
नज़्म
कभी हम-सिन हसीनों में बहुत ख़ुश-काम ओ दिल-रफ़्ता
कभी पेचाँ बगूला साँ कभी ज्यूँ चश्म-ए-ख़ूँ-बस्ता
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
मैं रफ़्ता रफ़्ता पहुँचने लगा ब-सिन्न-ए-शुऊर
तो जुगनुओं की हक़ीक़त समझ में आने लगी
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
बार-ए-मशक़्क़त कम करने को खलियानों में काम से चूर
कम-सिन लड़के गाते होंगे लो देखो वो सुब्ह का नूर
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
कम-सिन हैं बे-ख़बर हैं उठती जवानियाँ हैं
क्या समझें ग़म के हाथों क्यूँ सर-गिरानियाँ हैं
अख़्तर शीरानी
नज़्म
लिया आग़ोश में फूलों की सीजों ने अमीरी को
मुहय्या ख़ाक ही ने कर दिए आसन फ़क़ीरी को