बेस्ट जान शायरी

अजब तेरी है महबूब सूरत

नज़र से गिर गए सब ख़ूबसूरत

हैदर अली आतिश

मुझ को मालूम है महबूब-परस्ती का अज़ाब

देर से चाँद निकलना भी ग़लत लगता है

अहमद कमाल परवाज़ी

क्या सितम है कि वो ज़ालिम भी है महबूब भी है

याद करते बने और भुलाए बने

कलीम आजिज़

मरता है जो महबूब की ठोकर पे 'नज़ीर' आह

फिर उस को कभी और कोई लत नहीं लगती

नज़ीर अकबराबादी

गुलाबों के नशेमन से मिरे महबूब के सर तक

सफ़र लम्बा था ख़ुशबू का मगर ही गई घर तक

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

हमारे दिल की हालत गेसु-ए-महबूब जाने है

परेशाँ की परेशानी परेशाँ ख़ूब जाने है

अज्ञात

कितने महबूब घरों से गए किस को मालूम

वापस आए हैं जो अपनों में ख़बर की सूरत

अख्तर लख़नवी

कोई समझाईयो यारो मिरा महबूब जाता है

मिरा मक़्सूद जाता है मिरा मतलूब जाता है

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

तू ही वो फूल है जो है महबूब

पत्ते पत्ते का डाली डाली का

नादिर शाहजहाँ पुरी

किसी महबूब-ए-गंदुम-गूँ की उल्फ़त में गुज़रते हैं

दम अपना जिस्म से या ख़ुल्द से आदम निकलता है

ज़ेबा