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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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अर्शी मालिक

ग़ज़ल 6

अशआर 8

तू छुड़ा कर हाथ इक दिन दफ़'अतन खो जाएगा

और मेरी जेब में तेरा पता रह जाएगा

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कूद कर दीवार 'अर्शी' ग़म घरों में बसे

अनगिनत ता'वीज़ दरवाज़ों पे लटके रह गए

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सब के सब मिल कर भी मुझ को ज़ेर कर सकते थे

मेरा अपना हाथ शामिल है मिरी पसपाई में

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इक 'उम्र से उल्फ़त के कटहरे में खड़ा है

भुगताए हैं इस दिल ने मुक़दमात मुसलसल

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किसी के लहजे की यख़-बस्तगी क़यामत थी

ठिठुर के रह गया लब पर सवाल का मौसम

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