aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
सब के लिए सवाल ये कब है कि क्या न हो
उन को तो मुझ से ज़िद है कि मेरा कहा न हो
सिगरटें चाय धुआँ रात गए तक बहसें
और कोई फूल सा आँचल कहीं नम होता है
रूदाद-ए-ग़म-ए-उल्फ़त उन से हम क्या कहते क्यूँकर कहते
इक हर्फ़ न निकला होंटों से और आँख में आँसू आ भी गए
हैरत है तुम को देख के मस्जिद में ऐ 'ख़ुमार'
क्या बात हो गई जो ख़ुदा याद आ गया
इक घर भी सलामत नहीं अब शहर-ए-वफ़ा में
तू आग लगाने को किधर जाए है प्यारे
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