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वाली आसी

लखनऊ, भारत

ग़ज़ल 24

शेर 19

उन्हें भी जीने के कुछ तजरबे हुए होंगे

जो कह रहे हैं कि मर जाना चाहते हैं हम

हम ख़ून की क़िस्तें तो कई दे चुके लेकिन

ख़ाक-ए-वतन क़र्ज़ अदा क्यूँ नहीं होता

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ज़माना और अभी ठोकरें लगाए हमें

अभी कुछ और सँवर जाना चाहते हैं हम

ई-पुस्तक 6

Armughan-e-Naat

 

1982

Jawahar Pare

 

1965

Mirza Ghalib Ke Lateefe

 

1985

Mirza Ghalib Ke Lateefe

 

1968

Mom

 

1999

Shahad

 

1983

 

चित्र शायरी 4

जिन की यादें हैं अभी दिल में निशानी की तरह वो हमें भूल गए एक कहानी की तरह दोस्तो ढूँड के हम सा कोई प्यासा लाओ हम तो आँसू भी जो पीते हैं तो पानी की तरह ग़म को सीने में छुपाए हुए रखना यारो ग़म महकते हैं बहुत रात की रानी की तरह तुम हमारे थे तुम्हें याद नहीं है शायद दिन गुज़रते हैं बरसते हुए पानी की तरह आज जो लोग तिरे ग़म पे हँसे हैं 'वाली' कल तुझे याद करेंगे वही 'फ़ानी' की तरह

 

वीडियो 8

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
Mere Fasane Ko Yun Lazawal

वाली आसी

Musalla Rakhte HaiN

वाली आसी

फिर वही रेग-ए-बयाबाँ का है मंज़र और हम

वाली आसी

हम अपने-आप पे भी ज़ाहिर कभी दिल का हाल नहीं करते

वाली आसी

ऑडियो 7

इश्क़ की राह में यूँ हद से गुज़र मत जाना

क्या हिज्र में जी निढाल करना

फिर वही रेग-ए-बयाबाँ का है मंज़र और हम

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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