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त्रिपुरारि

1986 | मुंबई, भारत

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हवा तू ही उसे ईद-मुबारक कहियो

और कहियो कि कोई याद किया करता है

मोहब्बत में शिकायत कर रहा हूँ

शिकायत में मोहब्बत कर रहा हूँ

तुम जिसे चाँद कहते हो वो अस्ल में

आसमाँ के बदन पर कोई घाव है

कितनी दिलकश हैं ये बारिश की फुवारें लेकिन

ऐसी बारिश में मिरी जान भी जा सकती है

जिसे तुम ढूँडती रहती हो मुझ में

वो लड़का जाने कब का मर चुका है

नींद आए तो कुछ सुराग़ मिले

कौन है दफ़्न मेरे ख़्वाबों में

शेर पढ़ते हुए ये तुम ने कभी सोचा है

शेर कहते हुए मैं कितनी दफ़ा मरता हूँ

ये बारिश कब रुकेगी कौन जाने

कहीं मैं मर जाऊँ तिश्नगी से

एक किरदार नया रोज़ जिया करता हूँ

मुझ को शाएर कहो एक अदाकार हूँ मैं

किसी पर भी यक़ीं कर लेते हो तुम

तुम्हारे साथ क्या धोका हुआ है

एक तस्वीर बनाई है ख़यालों ने अभी

और तस्वीर से इक शख़्स निकल आया है

उम्र भर लड़ता रहा हूँ उस से

वो जो इक शख़्स कभी था ही नहीं

जिन से मिलना हुआ उन से बिछड़ कर रोए

हम तो आँखों की हर इक हद से गुज़र कर रोए

कई लाशें हैं मुझ में दफ़्न या'नी

मैं क़ब्रिस्तान हूँ शुरूआत ही से

तुम मिरे पास आओ कि यही बेहतर है

पास आने से तो पहचान भी जा सकती है

मैं हासिल हो चुका हूँ जिस बदन को

उसी से पूछता हूँ क्या मिला है

प्यास ऐसी थी कि मैं सारा समुंदर पी गया

पर मिरे होंटों के ये दोनों किनारे जल गए

क़त्ल करना है नए ख़्वाब का सो डरता हूँ

काँप जाएँ मिरे हाथ ये ख़ूँ करते हुए

जब से गुज़रा है किसी हुस्न के बाज़ार से दिल

दिल को महसूस ये होता है कि बाज़ार हूँ मैं

मैं तिरे जिस्म के जब पार निकल जाऊँगा

वस्ल की रात बड़ी ग़ौर-तलब होगी वो

मैं अपने दरमियाँ से हट चुका हूँ

तो फिर क्या दरमियाँ रक्खा हुआ है

रूह है तर्जुमा पानियों का अगर

जिस्म या'नी समुंदर में इक नाव है