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प्रेमचंद के लेख
गालियाँ
मुबारक है वह शख्स जो इस वक्त गालियां खाता है। सारी बिरादरी की नज़रें उसकी तरफ उठती हैं। इतने सम्मान के बावजूद वह गरीब अत्यधिक विनम्रता से गर्दन झुकाए हुए है। कहीं-कहीं घर की औरतें यह फ़र्ज़ अदा करती हैं लेकिन ज़्यादातर जगहों पर डोमनियाँ यह पाक
कलाम-ए-अकबर पर एक नज़र
वली और मीर से लेकर अमीर-ओ-दाग़ तक उर्दू ज़बान ने जो रंग बदले हैं वो एशियाई शाइ’र के माहिरीन से मख़्फ़ी नहीं हैं। बेशक तख़य्युलात-ए-शाइ’री में ब-जुज़-ग़ालिब के कोई जदीद रविश नहीं इख़्तियार की गई। ताहम मुहावरात, बन्दिश, और उस्लूब-ए-बयान में मुख़्तलिफ़
उर्दू, हिन्दी, हिंदुस्तानी (1)
उर्दू, हिंदी, हिंदुस्तानी (1) यह सभी मानते हैं कि क़ौमी मज़बूती के लिए सामाजिक एकता ज़रूरी है और किसी क़ौम की ज़बान और लिपि इस सामाजिक एकता का एक ख़ास हिस्सा है। मोहतरमा ख़ालिदा अदीब ख़ानम ने अपने एक भाषण में तुर्की क़ौम की एकता को तुर्की ज़बान
अफ़्साना-निगार प्रेम चंद: तकनीक में Irony का इस्तेमाल
यह लेख मैं किसी सफ़ाई के तौर पर नहीं लिख रहा हूँ, बल्कि यह एहसास इसका कारण है कि प्रेमचंद के निधन के चौवालीस-पैंतालीस साल बाद भी लोगों ने पूरे प्रेमचंद को स्वीकार नहीं किया है। प्रेमचंद के एक पारखी राधाकृष्ण ने एक जगह लिखा है, "अपने दौर में बांग्ला में
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