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अमजद हैदराबादी

1878 - 1961 | हैदराबाद, भारत

प्रतिष्ठित शायर, अपनी रुबाई के लिए मशहूर

प्रतिष्ठित शायर, अपनी रुबाई के लिए मशहूर

ग़ज़ल 1

 

शेर 3

ढूँडती हैं जिसे मिरी आँखें

वो तमाशा नज़र नहीं आता

झोलियाँ सब की भरती जाती हैं

देने वाला नज़र नहीं आता

बर्बाद कर बेकस का चमन बेदर्द ख़िज़ाँ से कौन कहे

ताराज कर मेरा ख़िर्मन उस बर्क़-ए-तपाँ से कौन कहे

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रुबाई 16

पुस्तकें 5

Rubaiyat-e-Amjad

Part-001

1953

रुबाइयात-ए-अमजद

भाग-001

 

Rubaiyat-e-Amjad

Part-002

 

Rubaiyat-e-Amjad

Part-003

1955

Yadgar-e-Amjad

 

1961

 

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