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असर सहबाई

1901 - 1963

प्रसिद्ध शायर, रूमान और सामाजिक चेतना की नज़्में,ग़ज़लें और रुबाईयाँ कहीं

प्रसिद्ध शायर, रूमान और सामाजिक चेतना की नज़्में,ग़ज़लें और रुबाईयाँ कहीं

ये हुस्न-ए-दिल-फ़रेब ये आलम शबाब का

गोया छलक रहा है पियाला शराब का

तुम्हारी याद में दुनिया को हूँ भुलाए हुए

तुम्हारे दर्द को सीने से हूँ लगाए हुए

जिस हुस्न की है चश्म-ए-तमन्ना को जुस्तुजू

वो आफ़्ताब में है है माहताब में

तेरे शबाब ने किया मुझ को जुनूँ से आश्ना

मेरे जुनूँ ने भर दिए रंग तिरी शबाब में

सारी दुनिया से बे-नियाज़ी है

वाह मस्त-ए-नाज़ क्या कहना

आह क्या क्या आरज़ूएँ नज़्र-ए-हिरमाँ हो गईं

रोइए किस किस को और किस किस का मातम कीजिए

सज्दे के दाग़ से हुई आश्ना जबीं

बेगाना-वार गुज़रे हर इक आस्ताँ से हम

इलाही कश्ती-ए-दिल बह रही है किस समुंदर में

निकल आती हैं मौजें हम जिसे साहिल समझते हैं

जहाँ पे छाया सहाब-ए-मस्ती बरस रही है शराब-ए-मस्ती

ग़ज़ब है रंग-ए-शबाब-ए-मस्ती कि रिंद ज़ाहिद बहक रहे हैं