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ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

1914 - 1993 | दिल्ली, भारत

202
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निखर गए हैं पसीने में भीग कर आरिज़

गुलों ने और भी शबनम से ताज़गी पाई

your cheeks with perspiration are all aglow anew

these flowers are now fresher laden with the dew

your cheeks with perspiration are all aglow anew

these flowers are now fresher laden with the dew

रह-ए-तलब में किसे आरज़ू-ए-मंज़िल है

शुऊर हो तो सफ़र ख़ुद सफ़र का हासिल है

छटे ग़ुबार-ए-नज़र बाम-ए-तूर जाए

पियो शराब कि चेहरे पे नूर जाए

बस्तियों में होने को हादसे भी होते हैं

पत्थरों की ज़द पर कुछ आईने भी होते हैं

किसी के हाथ में जाम-ए-शराब आया है

कि माहताब तह-ए-आफ़्ताब आया है

ये चार दिन की रिफ़ाक़त भी कम नहीं दोस्त

तमाम उम्र भला कौन साथ देता है

यादों के साए हैं उमीदों के हैं चराग़

हर शय ने साथ छोड़ दिया है तिरी तरह

तबाहियों का तो दिल की गिला नहीं लेकिन

किसी ग़रीब का ये आख़िरी सहारा था

ग़ुबार-ए-राह चला साथ ये भी क्या कम है

सफ़र में और कोई हम-सफ़र मिले मिले

मेरे अफ़्कार की रानाइयाँ तेरे दम से

मेरी आवाज़ में शामिल तिरी आवाज़ भी है

ग़म-ए-ज़िंदगी इक मुसलसल अज़ाब

ग़म-ए-ज़िंदगी से मफ़र भी नहीं

लब-ए-निगार को ज़हमत दो ख़ुदा के लिए

हम अहल-ए-शौक़ ज़बान-ए-नज़र समझते हैं

मैं ने कब दावा-ए-इल्हाम किया है 'ताबाँ'

लिख दिया करता हूँ जो दिल पे गुज़रती जाए

आँसुओं से कोई आवाज़ को निस्बत सही

भीगती जाए तो कुछ और निखरती जाए

जनाब-ए-शैख़ समझते हैं ख़ूब रिंदों को

जनाब-ए-शैख़ को हम भी मगर समझते हैं

बड़े बड़ों के क़दम डगमगा गए 'ताबाँ'

रह-ए-हयात में ऐसे मक़ाम भी आए

मंज़िलें राह में थीं नक़्श-ए-क़दम की सूरत

हम ने मुड़ कर भी देखा किसी मंज़िल की तरफ़

शबाब-ए-हुस्न है बर्क़-ओ-शरर की मंज़िल है

ये आज़माइश-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र की मंज़िल है

ये मय-कदा है कलीसा ख़ानक़ाह नहीं

उरूज-ए-फ़िक्र फ़रोग़-ए-नज़र की मंज़िल है

जुनूँ में और ख़िरद में दर-हक़ीक़त फ़र्क़ इतना है

वो ज़ेर-ए-दर है साक़ी और ये ज़ेर-ए-दाम है साक़ी

हमारी तरह ख़राब-ए-सफ़र हो कोई

इलाही यूँ तो किसी का राहबर गुम हो

उधर चमन में ज़र-ए-गुल लुटा इधर 'ताबाँ'

हमारी बे-सर-ओ-सामानियों के दिन आए