ग़ज़ल 8

शेर 2

रफ़्ता रफ़्ता ज़ेहन के सब क़ुमक़ुमे बुझ जाएँगे

और इक अंधे नगर का रास्ता रह जाएगा

कितने बन-बास लिए फिर भी तिरे साथ रहे

हम ने सोचा ही नहीं तुझ से जुदा हो जाना

 

पुस्तकें 1

Subh Aane Ko Hai

 

2000

 

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