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जमुना प्रसाद राही

अलीगढ़, भारत

जमुना प्रसाद राही

ग़ज़ल 13

अशआर 14

कच्ची दीवारें सदा-नोशी में कितनी ताक़ थीं

पत्थरों में चीख़ कर देखा तो अंदाज़ा हुआ

कश्तियाँ डूब रही हैं कोई साहिल लाओ

अपनी आँखें मिरी आँखों के मुक़ाबिल लाओ

जो सुनते हैं कि तिरे शहर में दसहरा है

हम अपने घर में दिवाली सजाने लगते हैं

गाँव से गुज़रेगा और मिट्टी के घर ले जाएगा

एक दिन दरिया सभी दीवार दर ले जाएगा

सदियों का इंतिशार फ़सीलों में क़ैद था

दस्तक ये किस ने दी कि इमारत बिखर गई

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पुस्तकें 2

 

ऑडियो 11

कुछ तो सच्चाई के शहकार नज़र में आते

कश्तियाँ डूब रही हैं कोई साहिल लाओ

कोहसार-ए-तग़ाफ़ुल को सदा काट रही है

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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