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महताब ज़फ़र

1931 - 1992 | कराची, पाकिस्तान

ग़ज़ल 1

 

शेर 3

ज़बाँ ज़बाँ पे शोर था कि रात ख़त्म हो गई

यहाँ सहर की आस में हयात ख़त्म हो गई

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जिन की हसरत में दिल-ए-रुस्वा ने ग़म खाए बहुत

संग हम पर इन दरीचों ने ही बरसाए बहुत

एक रस्म-ए-सरफ़रोशी थी सो रुख़्सत हो गई

यूँ तो दीवाने हमारे ब'अद भी आए बहुत

 

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