ग़ज़ल 6

शेर 5

ज़िंदगी ख़्वाब देखती है मगर

ज़िंदगी ज़िंदगी है ख़्वाब नहीं

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यूँ तो अश्कों से भी होता है अलम का इज़हार

हाए वो ग़म जो तबस्सुम से अयाँ होता है

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मुझे ये ज़ोम कि मैं हुस्न का मुसव्विर हूँ

उन्हें ये नाज़ कि तस्वीर तो हमारी है

पुस्तकें 3

Chashm-e-Khayal

 

1994

Khushboo Ki Dhanak

 

1996

Nawishta

 

1979

 

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