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मरयम ग़ज़ाला

1939 | अन्य, भारत

मरयम ग़ज़ाला

ग़ज़ल 4

 

नज़्म 2

 

अशआर 6

जब भी मैं ने खोल कर देखी है यादों की किताब

यूँही सफ़्हों पर तड़पते मिल गए कुछ वाक़िआ'त

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हम तो समझे थे हमें पहचानता कोई नहीं

अपनी बर्बादी तो घर घर की कहानी हो गई

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झील के ठहरे हुए पानी में पत्थर फेंक कर

दायरा उठती हुई लहरों का हम देखा किए

हर क़दम को सोच कर रखिएगा अब

हादिसा है राह में चलता हुआ

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दर-ओ-दीवार पे परछाइयाँ आती थीं नज़र

बात करने को भी तरसी हूँ सहर होने तक

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पुस्तकें 1

 

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