Natiq Lakhnavi's Photo'

नातिक़ लखनवी

1878 - 1950 | लखनऊ, भारत

ग़ज़ल 25

शेर 13

कह रहा है शोर-ए-दरिया से समुंदर का सुकूत

जिस का जितना ज़र्फ़ है उतना ही वो ख़ामोश है

the river's raging is advised by the tranquil sea

the greater power you possess, the quieter you be

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शम्अ' तुझ पे रात ये भारी है जिस तरह

मैं ने तमाम उम्र गुज़ारी है इस तरह

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मर मर के अगर शाम तो रो रो के सहर की

यूँ ज़िंदगी हम ने तिरी दूरी में बसर की

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दिल है किस का जिस में अरमाँ आप का रहता नहीं

फ़र्क़ इतना है कि सब कहते हैं मैं कहता नहीं

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दिल रहे या रहे ज़ख़्म भरे या भरे

चारासाज़ों की ख़ुशामद मुझे मंज़ूर नहीं

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पुस्तकें 3

Intikhab-e-Kalam Natiq Lucknowi

 

1997

Musafir Damishqi

 

1924

Nazm-e-Urdu

 

1941

 

चित्र शायरी 2

कह रहा है शोर-ए-दरिया से समुंदर का सुकूत जिस का जितना ज़र्फ़ है उतना ही वो ख़ामोश है

ऐ शम्अ' तुझ पे रात ये भारी है जिस तरह मैं ने तमाम उम्र गुज़ारी है इस तरह

 

ऑडियो 6

आँसुओं से ख़ून के अजज़ा बदलते जाएँगे

ऐ शम्मा तुझ पे रात ये भारी है जिस तरह

ख़ून-ए-दिल का जो कुछ अश्कों से पता मिलता है

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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