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नूह नारवी

1879 - 1962

अपने बेबाक लहजे के लिए विख्यात / ‘दाग़’ दहलवी के शागिर्द

अपने बेबाक लहजे के लिए विख्यात / ‘दाग़’ दहलवी के शागिर्द

ग़ज़ल 82

शेर 87

इक सितम ढाने में फ़र्द एक सितम सहने में

अल-ग़रज़ है तुम्हारा मिरा दिल नाक़िस

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काबा हो कि बुत-ख़ाना हो हज़रत-ए-वाइज़

जाएँगे जिधर आप जाएँगे उधर हम

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ख़ुदा के सज्दे बुतों के आगे फिर ऐसे सज्दे कि सर उट्ठे

अजब तरह की हमारी निय्यत नई तरह की नमाज़ में है

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ई-पुस्तक 3

Ejaz-e-Nooh

 

 

Ejaz-e-Nooh

 

 

कलाम-ए-हिज्र

 

1914

 

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आप जिन के क़रीब होते हैं

अज्ञात

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अज्ञात

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अज्ञात

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अज्ञात

आप जिन के क़रीब होते हैं

पंकज उदास

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