सफ़िया शमीम

ग़ज़ल 5

 

शेर 6

होना है दर्द-ए-इश्क़ से गर लज़्ज़त-आश्ना

दिल को ख़राब-ए-तल्ख़ी-ए-हिज्राँ तो कीजिए

जिस को दिल से लगा के रक्खा था

वो ख़ज़ाना लुटा गए आँसू

दश्त गुलज़ार हुआ जाता है

क्या यहाँ अहल-ए-वफ़ा बैठे थे

होश आया तो कहीं कुछ भी था

हम भी किस बज़्म में जा बैठे थे

रोना मुझे ख़िज़ाँ का नहीं कुछ मगर 'शमीम'

इस का गिला है आई चमन में बहार क्यूँ

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