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शाहिद अहसन मोरादाबादी

1925 | मुरादाबाद, भारत

शेर 4

तेरी ज़ुल्फ़ें तिरे आरिज़ तिरी आँखें तिरे लब

मैं ज़मींदार हूँ ये सब मिरी जागीरें हैं

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ज़िंदगी बीत गई गिनते हुए तारीख़ें

खा गई वक़्त की दीवार कैलेंडर कितने

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सोने वालों को जगाना तो है आसान मगर

जागने वालों को किस तरह जगाया जाए

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ये बात मुंसिफ़ों में अभी ज़ेर-ए-ग़ौर है

पत्थर को मैं लगा हूँ कि पत्थर लगा मुझे

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पुस्तकें 2

Dareecha

 

1990

Sabat

 

1987

 

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