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Shaikh Ibrahim Zauq's Photo'

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

1790 - 1854 | दिल्ली, भारत

आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के उस्ताद और राजकवि , मिर्ज़ा ग़ालिब से उनकी प्रतिद्वंदिता प्रसिद्ध है।

आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के उस्ताद और राजकवि , मिर्ज़ा ग़ालिब से उनकी प्रतिद्वंदिता प्रसिद्ध है।

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ की टॉप 20 शायरी

तुम भूल कर भी याद नहीं करते हो कभी

हम तो तुम्हारी याद में सब कुछ भुला चुके

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में शायर महबूब की बेरुखी और अपनी दीवानगी के बीच का अंतर दिखा रहे हैं। शायर शिकायत करता है कि महबूब उसे कभी धोखे से भी याद नहीं करता, जबकि उसने महबूब की यादों में खोकर बाकी पूरी दुनिया को भुला दिया है। यह सच्चे प्रेम में खुद को मिटा देने की भावना को दर्शाता है।

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में शायर महबूब की बेरुखी और अपनी दीवानगी के बीच का अंतर दिखा रहे हैं। शायर शिकायत करता है कि महबूब उसे कभी धोखे से भी याद नहीं करता, जबकि उसने महबूब की यादों में खोकर बाकी पूरी दुनिया को भुला दिया है। यह सच्चे प्रेम में खुद को मिटा देने की भावना को दर्शाता है।

अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे

मर के भी चैन पाया तो किधर जाएँगे

Interpretation: Rekhta AI

शायर जिंदगी के दुखों से तंग आकर मौत को ही आखिरी रास्ता मानता है, लेकिन उसे तुरंत एक डर सताता है। वह सोचता है कि अगर मरने के बाद भी उसे सुकून नहीं मिला, तो उसके पास जाने के लिए कोई जगह नहीं बचेगी। यह शेर नाउम्मीदी की उस हालत को दिखाता है जहाँ इंसान को मुक्ति का कोई भी रास्ता नहीं दिखता।

Interpretation: Rekhta AI

शायर जिंदगी के दुखों से तंग आकर मौत को ही आखिरी रास्ता मानता है, लेकिन उसे तुरंत एक डर सताता है। वह सोचता है कि अगर मरने के बाद भी उसे सुकून नहीं मिला, तो उसके पास जाने के लिए कोई जगह नहीं बचेगी। यह शेर नाउम्मीदी की उस हालत को दिखाता है जहाँ इंसान को मुक्ति का कोई भी रास्ता नहीं दिखता।

ज़ाहिद शराब पीने से काफ़िर हुआ मैं क्यूँ

क्या डेढ़ चुल्लू पानी में ईमान बह गया

EXPLANATION #1

यह शे’र मायनी और लक्षण दोनों दृष्टि से दिलचस्प है। शे’र में वही शब्द इस्तेमाल किए गए हैं, जिन्हें उर्दू ग़ज़ल की परम्परा की विशेषता समझा जाता है। जैसे ज़ाहिद-ए-शराब, काफ़िर, ईमान। मगर मायनी की सतह पर ज़ौक़ ने व्यंग्य के लहजे से जो बात पैदा की है वो पाठक को चौंका देती है। शे’र में ज़ाहिद के सम्बंध से शराब, काफ़िर के सम्बंध से ईमान के अलावा पीने, पानी और बहने से जो स्थिति पैदा हुई है वो अपने आप में एक शायराना कमाल है। ज़ाहिद उर्दू ग़ज़ल की परम्परा में उन पात्रों में से एक है जिन पर शायरों ने खुल कर तंज़ किए हैं।

शे’र के किरदार ज़ाहिद से सवाल पूछता है कि शराब पीने से आदमी काफ़िर कैसे हो सकता है, क्या ईमान इस क़दर कमज़ोर चीज़ होती है कि ज़रा से पानी के साथ बह जाती है। इस शे’र के पंक्तियों के बीच में ज़ाहिद पर जो तंज़ किया गया है वो “डेढ़ चुल्लू” पानी से स्पष्ट होता है। यानी मैंने तो ज़रा सी शराब पी ली है और तुमने मुझ पर काफ़िर होने का फ़तवा जारी कर दिया। क्या तुम्हारी नज़र में ईमान इतनी कमज़ोर चीज़ है कि ज़रा सी शराब पीने से ख़त्म हो जाती है।

शफ़क़ सुपुरी

EXPLANATION #1

यह शे’र मायनी और लक्षण दोनों दृष्टि से दिलचस्प है। शे’र में वही शब्द इस्तेमाल किए गए हैं, जिन्हें उर्दू ग़ज़ल की परम्परा की विशेषता समझा जाता है। जैसे ज़ाहिद-ए-शराब, काफ़िर, ईमान। मगर मायनी की सतह पर ज़ौक़ ने व्यंग्य के लहजे से जो बात पैदा की है वो पाठक को चौंका देती है। शे’र में ज़ाहिद के सम्बंध से शराब, काफ़िर के सम्बंध से ईमान के अलावा पीने, पानी और बहने से जो स्थिति पैदा हुई है वो अपने आप में एक शायराना कमाल है। ज़ाहिद उर्दू ग़ज़ल की परम्परा में उन पात्रों में से एक है जिन पर शायरों ने खुल कर तंज़ किए हैं।

शे’र के किरदार ज़ाहिद से सवाल पूछता है कि शराब पीने से आदमी काफ़िर कैसे हो सकता है, क्या ईमान इस क़दर कमज़ोर चीज़ होती है कि ज़रा से पानी के साथ बह जाती है। इस शे’र के पंक्तियों के बीच में ज़ाहिद पर जो तंज़ किया गया है वो “डेढ़ चुल्लू” पानी से स्पष्ट होता है। यानी मैंने तो ज़रा सी शराब पी ली है और तुमने मुझ पर काफ़िर होने का फ़तवा जारी कर दिया। क्या तुम्हारी नज़र में ईमान इतनी कमज़ोर चीज़ है कि ज़रा सी शराब पीने से ख़त्म हो जाती है।

शफ़क़ सुपुरी

'ज़ौक़' तकल्लुफ़ में है तकलीफ़ सरासर

आराम में है वो जो तकल्लुफ़ नहीं करता

EXPLANATION #1

यह ज़ौक़ का एक ख़ूबसूरत शे’र है और इसमें ज़ौक़ ने एक अहम नुक्ते वाली बात बताई है। हालांकि इस शे’र का अहम लफ़्ज़ तकल्लुफ़ है मगर तकलीफ़ और तकल्लुफ़ की रियायत भी खूब मज़ा देती है।

ज़ौक़ इस शे’र में तकल्लुफ़ यानी बनावट की नई बात पर रौशनी डालते हैं। बनावट वो चीज़ होती है जिसमें हक़ीक़त हो यानी जो बनावटी हो। बनावट ज़िंदगी के सारे मामले में भी होती है और रिश्तों में भी। आम मामले में बनावट से तात्पर्य ये है कि आदमी अपनी वो हैसियत दिखाने की कोशिश करे जो वो नहीं है और रिश्तों में बनावट से तात्पर्य ऐसी भावनाओं को प्रगट करना जो वास्तविक हों। बहरहाल मामला जो भी है अगर इंसान आम मामले में बनावट से काम ले तो ख़ुद को ही नुक़्सान पहुँचाता है और अगर रिश्तों में बनावट से काम ले तो एक एक दिन तो बनावट खुल ही जाती है फिर रिश्ते टूट जाते हैं।

ज़ौक़ कहते कि दरअसल बनावट और दिखावा एक भरपूर तकलीफ़ है और जो आदमी बनावट से काम नहीं लेता हालांकि वक़्ती तौर पर उसे तकलीफ़ महसूस होती है मगर आख़िरकार वह आराम में होता है। इसलिए इंसान को दिखावे से बचना चाहिए।

शफ़क़ सुपुरी

EXPLANATION #1

यह ज़ौक़ का एक ख़ूबसूरत शे’र है और इसमें ज़ौक़ ने एक अहम नुक्ते वाली बात बताई है। हालांकि इस शे’र का अहम लफ़्ज़ तकल्लुफ़ है मगर तकलीफ़ और तकल्लुफ़ की रियायत भी खूब मज़ा देती है।

ज़ौक़ इस शे’र में तकल्लुफ़ यानी बनावट की नई बात पर रौशनी डालते हैं। बनावट वो चीज़ होती है जिसमें हक़ीक़त हो यानी जो बनावटी हो। बनावट ज़िंदगी के सारे मामले में भी होती है और रिश्तों में भी। आम मामले में बनावट से तात्पर्य ये है कि आदमी अपनी वो हैसियत दिखाने की कोशिश करे जो वो नहीं है और रिश्तों में बनावट से तात्पर्य ऐसी भावनाओं को प्रगट करना जो वास्तविक हों। बहरहाल मामला जो भी है अगर इंसान आम मामले में बनावट से काम ले तो ख़ुद को ही नुक़्सान पहुँचाता है और अगर रिश्तों में बनावट से काम ले तो एक एक दिन तो बनावट खुल ही जाती है फिर रिश्ते टूट जाते हैं।

ज़ौक़ कहते कि दरअसल बनावट और दिखावा एक भरपूर तकलीफ़ है और जो आदमी बनावट से काम नहीं लेता हालांकि वक़्ती तौर पर उसे तकलीफ़ महसूस होती है मगर आख़िरकार वह आराम में होता है। इसलिए इंसान को दिखावे से बचना चाहिए।

शफ़क़ सुपुरी

'ज़ौक़' देख दुख़्तर-ए-रज़ को मुँह लगा

छुटती नहीं है मुँह से ये काफ़र लगी हुई

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में शायर ने शराब की लत से बचने की सलाह दी है। शराब को 'दुख़्तर-ए-रज़' और 'काफ़िर' कहकर पुकारा गया है, जिसका मतलब है कि यह एक ऐसी जालिम चीज़ है जो अगर एक बार आदत बन जाए तो छूटती नहीं है। इसमें नशे की बुराई और उसकी मज़बूत पकड़ को दर्शाया गया है।

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में शायर ने शराब की लत से बचने की सलाह दी है। शराब को 'दुख़्तर-ए-रज़' और 'काफ़िर' कहकर पुकारा गया है, जिसका मतलब है कि यह एक ऐसी जालिम चीज़ है जो अगर एक बार आदत बन जाए तो छूटती नहीं है। इसमें नशे की बुराई और उसकी मज़बूत पकड़ को दर्शाया गया है।

'ज़ौक़' जो मदरसे के बिगड़े हुए हैं मुल्ला

उन को मय-ख़ाने में ले आओ सँवर जाएँगे

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में शायर ने धार्मिक दिखावे पर कटाक्ष किया है। उनका मानना है कि मदरसे की किताबी पढ़ाई ने मुल्लाओं को घमंडी बना दिया है, जबकि मयखाना (प्रेम और मस्ती की जगह) उनके अहंकार को मिटाकर उन्हें विनम्रता सिखाएगा, जिससे उनका चरित्र सँवर जाएगा।

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में शायर ने धार्मिक दिखावे पर कटाक्ष किया है। उनका मानना है कि मदरसे की किताबी पढ़ाई ने मुल्लाओं को घमंडी बना दिया है, जबकि मयखाना (प्रेम और मस्ती की जगह) उनके अहंकार को मिटाकर उन्हें विनम्रता सिखाएगा, जिससे उनका चरित्र सँवर जाएगा।

एक आँसू ने डुबोया मुझ को उन की बज़्म में

बूँद भर पानी से सारी आबरू पानी हुई

Interpretation: Rekhta AI

शायर कहता है कि महबूब की महफिल में मैं अपने जज़्बात काबू में रख सका और एक आँसू निकल पड़ा। उस एक बूँद ने मुझे 'डुबो' दिया, यानी मेरी सारी इज्ज़त पानी में मिल गई; यहाँ 'पानी होना' मुहावरे का प्रयोग इज्ज़त जाने और शर्मिंदा होने के लिए किया गया है।

Interpretation: Rekhta AI

शायर कहता है कि महबूब की महफिल में मैं अपने जज़्बात काबू में रख सका और एक आँसू निकल पड़ा। उस एक बूँद ने मुझे 'डुबो' दिया, यानी मेरी सारी इज्ज़त पानी में मिल गई; यहाँ 'पानी होना' मुहावरे का प्रयोग इज्ज़त जाने और शर्मिंदा होने के लिए किया गया है।

बजा कहे जिसे आलम उसे बजा समझो

ज़बान-ए-ख़ल्क़ को नक़्क़ारा-ए-ख़ुदा समझो

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में जनमत या 'पब्लिक ओपिनियन' की ताकत को बताया गया है। शायर का मानना है कि जब सारी दुनिया किसी बात को सही मानती है, तो वह ईश्वरीय संकेत के समान होता है। लोगों की सामूहिक आवाज़ को ईश्वर का आदेश मानकर स्वीकार करना चाहिए।

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में जनमत या 'पब्लिक ओपिनियन' की ताकत को बताया गया है। शायर का मानना है कि जब सारी दुनिया किसी बात को सही मानती है, तो वह ईश्वरीय संकेत के समान होता है। लोगों की सामूहिक आवाज़ को ईश्वर का आदेश मानकर स्वीकार करना चाहिए।

मालूम जो होता हमें अंजाम-ए-मोहब्बत

लेते कभी भूल के हम नाम-ए-मोहब्बत

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में शायर प्यार में मिलने वाले दुखों से परेशान होकर पछतावा जाहिर कर रहे हैं। उनका कहना है कि इश्क का अंजाम इतना दर्दनाक है कि अगर हमें पहले से खबर होती, तो हम प्यार करना तो दूर, उसका नाम लेने से भी बचते।

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में शायर प्यार में मिलने वाले दुखों से परेशान होकर पछतावा जाहिर कर रहे हैं। उनका कहना है कि इश्क का अंजाम इतना दर्दनाक है कि अगर हमें पहले से खबर होती, तो हम प्यार करना तो दूर, उसका नाम लेने से भी बचते।

हम रोने पे जाएँ तो दरिया ही बहा दें

शबनम की तरह से हमें रोना नहीं आता

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ अपने दुःख की गहराई को बढ़ा-चढ़ाकर बता रहे हैं। उनका कहना है कि वह ओस की तरह चुपचाप या कम नहीं रो सकते; उनका दर्द इतना ज़्यादा है कि जब वह रोते हैं तो मानो बाढ़ जाती है, वे खुल कर अपने जज़्बात जाहिर करने में यकीन रखते हैं।

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ अपने दुःख की गहराई को बढ़ा-चढ़ाकर बता रहे हैं। उनका कहना है कि वह ओस की तरह चुपचाप या कम नहीं रो सकते; उनका दर्द इतना ज़्यादा है कि जब वह रोते हैं तो मानो बाढ़ जाती है, वे खुल कर अपने जज़्बात जाहिर करने में यकीन रखते हैं।

लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले

अपनी ख़ुशी आए अपनी ख़ुशी चले

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर इंसान की बेबसी और जीवन-मरण पर उसके वश होने की हकीकत बयां करता है। कवि कहते हैं कि जन्म और मृत्यु दोनों ही हमारे हाथ में नहीं हैं, हम तो बस नियति के खेल का हिस्सा हैं। आना हमारे वश में था और जाना हमारी मर्जी से हो रहा है, सब कुछ पहले से तय है।

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर इंसान की बेबसी और जीवन-मरण पर उसके वश होने की हकीकत बयां करता है। कवि कहते हैं कि जन्म और मृत्यु दोनों ही हमारे हाथ में नहीं हैं, हम तो बस नियति के खेल का हिस्सा हैं। आना हमारे वश में था और जाना हमारी मर्जी से हो रहा है, सब कुछ पहले से तय है।

कितने मुफ़लिस हो गए कितने तवंगर हो गए

ख़ाक में जब मिल गए दोनों बराबर हो गए

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर बताता है कि अमीरी और गरीबी का भेद केवल जीवन तक ही सीमित है। कवि कहते हैं कि मौत सबसे बड़ा इन्साफ करने वाली है जो अमीर और गरीब को एक स्तर पर ले आती है। अंत में, हर इंसान को मिट्टी में ही मिल जाना है, चाहे उसका रुतबा कुछ भी हो।

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर बताता है कि अमीरी और गरीबी का भेद केवल जीवन तक ही सीमित है। कवि कहते हैं कि मौत सबसे बड़ा इन्साफ करने वाली है जो अमीर और गरीब को एक स्तर पर ले आती है। अंत में, हर इंसान को मिट्टी में ही मिल जाना है, चाहे उसका रुतबा कुछ भी हो।

आदमिय्यत और शय है इल्म है कुछ और शय

कितना तोते को पढ़ाया पर वो हैवाँ ही रहा

Interpretation: Rekhta AI

शायर यहाँ ज्ञान और इंसानियत (अच्छे व्यवहार) के बीच का अंतर समझा रहे हैं। उनका कहना है कि सिर्फ़ ज्ञान पा लेने से कोई अच्छा इंसान नहीं बन जाता, जैसे तोते को रटाने के बाद भी वह जानवर ही रहता है। असली महत्त्व अच्छे स्वभाव और मनुष्यता का है, केवल रटने या पढ़ने का नहीं।

Interpretation: Rekhta AI

शायर यहाँ ज्ञान और इंसानियत (अच्छे व्यवहार) के बीच का अंतर समझा रहे हैं। उनका कहना है कि सिर्फ़ ज्ञान पा लेने से कोई अच्छा इंसान नहीं बन जाता, जैसे तोते को रटाने के बाद भी वह जानवर ही रहता है। असली महत्त्व अच्छे स्वभाव और मनुष्यता का है, केवल रटने या पढ़ने का नहीं।

नाज़ है गुल को नज़ाकत पे चमन में 'ज़ौक़'

उस ने देखे ही नहीं नाज़-ओ-नज़ाकत वाले

Interpretation: Rekhta AI

शायर कहता है कि गुलाब का अपनी कोमलता पर इतराना बेकार है। यह घमंड केवल इसलिए है क्योंकि उसने अब तक महबूब की असली सुंदरता और नज़ाकत को नहीं देखा है। महबूब के सामने फूल की कोमलता कुछ भी नहीं है।

Interpretation: Rekhta AI

शायर कहता है कि गुलाब का अपनी कोमलता पर इतराना बेकार है। यह घमंड केवल इसलिए है क्योंकि उसने अब तक महबूब की असली सुंदरता और नज़ाकत को नहीं देखा है। महबूब के सामने फूल की कोमलता कुछ भी नहीं है।

बोसा जो रुख़ का देते नहीं लब का दीजिए

ये है मसल कि फूल नहीं पंखुड़ी सही

Interpretation: Rekhta AI

शायर अपने महबूब से बड़ी चतुराई से प्रेम की मांग कर रहा है। वह तर्क देता है कि चेहरा फूल जैसा है और होंठ पंखुड़ी जैसे, इसलिए अगर गाल (फूल) का बोसा नहीं मिल सकता, तो 'समझौते' के तौर पर होंठ (पंखुड़ी) का बोसा ही दे दें।

Interpretation: Rekhta AI

शायर अपने महबूब से बड़ी चतुराई से प्रेम की मांग कर रहा है। वह तर्क देता है कि चेहरा फूल जैसा है और होंठ पंखुड़ी जैसे, इसलिए अगर गाल (फूल) का बोसा नहीं मिल सकता, तो 'समझौते' के तौर पर होंठ (पंखुड़ी) का बोसा ही दे दें।

मस्जिद में उस ने हम को आँखें दिखा के मारा

काफ़िर की शोख़ी देखो घर में ख़ुदा के मारा

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर प्रेमी की निडरता और माशूक की नज़रों की ताक़त को दिखाता है। शायर अपने महबूब को मज़ाक में 'काफ़िर' (अधर्मी) कहते हैं क्योंकि उसने मस्जिद जैसी पवित्र जगह का भी लिहाज़ नहीं किया और वहाँ भी अपनी नज़रों के वार से प्रेमी को घायल कर दिया।

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर प्रेमी की निडरता और माशूक की नज़रों की ताक़त को दिखाता है। शायर अपने महबूब को मज़ाक में 'काफ़िर' (अधर्मी) कहते हैं क्योंकि उसने मस्जिद जैसी पवित्र जगह का भी लिहाज़ नहीं किया और वहाँ भी अपनी नज़रों के वार से प्रेमी को घायल कर दिया।

शम्अ तेरी उम्र-ए-तबीई है एक रात

हँस कर गुज़ार या इसे रो कर गुज़ार दे

Interpretation: Rekhta AI

शायर मोमबत्ती का उदाहरण देकर समझा रहे हैं कि जीवन बहुत छोटा है, जैसे शमा की उम्र बस एक रात की होती है। जब अंत निश्चित है और समय कम है, तो दुख मनाने से समय नहीं रुकेगा। यह शेर हमें सीख देता है कि जीवन की इस छोटी सी अवधि को रोने के बजाय खुशी और हिम्मत से बिताना चाहिए।

Interpretation: Rekhta AI

शायर मोमबत्ती का उदाहरण देकर समझा रहे हैं कि जीवन बहुत छोटा है, जैसे शमा की उम्र बस एक रात की होती है। जब अंत निश्चित है और समय कम है, तो दुख मनाने से समय नहीं रुकेगा। यह शेर हमें सीख देता है कि जीवन की इस छोटी सी अवधि को रोने के बजाय खुशी और हिम्मत से बिताना चाहिए।

हक़ ने तुझ को इक ज़बाँ दी और दिए हैं कान दो

इस के ये मअ'नी कहे इक और सुने इंसान दो

Interpretation: Rekhta AI

शायर कहता है कि कुदरत ने इंसान के शरीर की बनावट ही ऐसी रखी है जिससे हमें जीने का तरीका समझ आए। एक जीभ और दो कानों का होना यह इशारा करता है कि समझदार इंसान को कम बोलना चाहिए और ज्यादा सुनना चाहिए, ताकि उसका ज्ञान बढ़ सके।

Interpretation: Rekhta AI

शायर कहता है कि कुदरत ने इंसान के शरीर की बनावट ही ऐसी रखी है जिससे हमें जीने का तरीका समझ आए। एक जीभ और दो कानों का होना यह इशारा करता है कि समझदार इंसान को कम बोलना चाहिए और ज्यादा सुनना चाहिए, ताकि उसका ज्ञान बढ़ सके।

ख़त बढ़ा काकुल बढ़े ज़ुल्फ़ें बढ़ीं गेसू बढ़े

हुस्न की सरकार में जितने बढ़े हिन्दू बढ़े

Interpretation: Rekhta AI

शायर ने यहाँ पुरानी शायरी की परंपरा के अनुसार 'हिन्दू' शब्द का प्रयोग काले रंग के प्रतीक के रूप में किया है। वे कहते हैं कि महबूब के चेहरे पर काले बालों का प्रभाव बढ़ गया है, जिसे देखकर लगता है कि हुस्न की सरकार में केवल काले बालों (हिन्दुओं) की ही तरक्की हो रही है।

Interpretation: Rekhta AI

शायर ने यहाँ पुरानी शायरी की परंपरा के अनुसार 'हिन्दू' शब्द का प्रयोग काले रंग के प्रतीक के रूप में किया है। वे कहते हैं कि महबूब के चेहरे पर काले बालों का प्रभाव बढ़ गया है, जिसे देखकर लगता है कि हुस्न की सरकार में केवल काले बालों (हिन्दुओं) की ही तरक्की हो रही है।

सब को दुनिया की हवस ख़्वार लिए फिरती है

कौन फिरता है ये मुर्दार लिए फिरती है

Interpretation: Rekhta AI

शायर कहता है कि दुनिया का मोह इंसान को जलील करता है। लोग यह समझते हैं कि वे अपनी मर्जी से चल रहे हैं, लेकिन असल में सांसारिक लालच (जिसे मुर्दार या शव कहा गया है) उन्हें अपने पीछे-पीछे अपमानजनक स्थिति में घसीट रहा है।

Interpretation: Rekhta AI

शायर कहता है कि दुनिया का मोह इंसान को जलील करता है। लोग यह समझते हैं कि वे अपनी मर्जी से चल रहे हैं, लेकिन असल में सांसारिक लालच (जिसे मुर्दार या शव कहा गया है) उन्हें अपने पीछे-पीछे अपमानजनक स्थिति में घसीट रहा है।

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