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शमीम फ़ारूक़ी

पटना, भारत

ग़ज़ल 7

शेर 2

हसीन रुत है मगर कौन घर से निकलेगा

हर इक बदन में समाया हुआ है डर अब के

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दूर तक फैला हुआ है एक अन-जाना सा ख़ौफ़

इस से पहले ये समुंदर इस क़दर बरहम था

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पुस्तकें 4

हाली फ़न और शख़्सियत

 

1986

Muslim Siyasat Ka Daur-e-Jadeed

 

1940

Shaheed-e-Insaniyat Nasir

 

1971

Zaiqa Mere Lahoo Ka

 

1987

 

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