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शारिब लखनवी

लखनऊ, भारत

ग़ज़ल 23

शेर 2

वो मिरे पास से गुज़रे तो ये मालूम हुआ

ज़िंदगी यूँ भी दबे पाँव गुज़र जाती है

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गुल तोड़ लिया शाख़ से ये कह के ख़िज़ाँ ने

ये एक तबस्सुम का गुनहगार हुआ है

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पुस्तकें 1

फ़िर्दौस-ए-नज़र

 

1972

 

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