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वहीद अख़्तर

1935 - 1996 | अलीगढ़, भारत

अग्रणी आधुनिक शायरों और आलोचकों में विख्यात।

अग्रणी आधुनिक शायरों और आलोचकों में विख्यात।

ग़ज़ल 26

शेर 23

जो सुनना चाहो तो बोल उट्ठेंगे अँधेरे भी

सुनना चाहो तो दिल की सदा सुनाई दे

हज़ारों साल सफ़र कर के फिर वहीं पहुँचे

बहुत ज़माना हुआ था हमें ज़मीं से चले

माँगने वालों को क्या इज़्ज़त रुस्वाई से

देने वालों की अमीरी का भरम खुलता है

नींद बन कर मिरी आँखों से मिरे ख़ूँ में उतर

रत-जगा ख़त्म हो और रात मुकम्मल हो जाए

बे-बरसे गुज़र जाते हैं उमडे हुए बादल

जैसे उन्हें मेरा ही पता याद नहीं है

पुस्तकें 14

हिंदुस्तानी अदब के मेमार: वहीद अख़्तर

 

2008

Karbala Ta Karbala

 

1990

khwaja Meer Dard

Tasawwuf aur Shayari

1971

Kulliyat-e-Waheed Akhtar

Volume-003

2009

Kulliyat-e-Waheed Akhtar

Volume-001

2009

Kulliyat-e-Waheed Akhtar

Volume-002

2009

पत्थरों का मुग़न्नी

 

1966

Pattharon Ka Mughanni

 

1966

शब का रज़मिया

 

1973

Shab Ka Razmiya

 

1973

ऑडियो 10

ज़बान-ए-ख़ल्क़ पे आया तो इक फ़साना हुआ

जिस को माना था ख़ुदा ख़ाक का पैकर निकला

तू ग़ज़ल बन के उतर बात मुकम्मल हो जाए

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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