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ग़ज़ल
न तो काम रखिए शिकार से न तो दिल लगाइए सैर से
बस अब आगे हज़रत-ए-इश्क़-जी चले जाइए घर ही को ख़ैर से
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
ये तकमील-ए-मोहब्बत है कि तौफ़ीक़-ए-ख़ुदावंदी
मुझे हर इंतिहा अब इब्तिदा मालूम होती है
मुनीर भोपाली
ग़ज़ल
बंदा-ए-ख़्वाहिशात को कहता है कौन अब्द-ए-हुर
चाहिए हुर्रियत अगर दिल को 'अमीं' ग़ुलाम कर













