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ग़ज़ल
मैं चाहत एक ऐसे मोड़ पर लाने का क़ाइल हूँ
जहाँ पर चाहने वाला ये कहता है जुदाई दे
सागर हुज़ूरपूरी
नज़्म
साक़ी
ख़त-ए-पैमाना अरक़-ए-मौज-ए-सहबा होता जाता है
इजाज़त हो कि अब आगे ख़ुदा का नाम है साक़ी
शमीम फ़ारूक़ बांस पारी
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हास्य
ये मेरी अर्क़-रेज़ी से तो कुछ नम हो गई है
अब इस बंजर ज़मीं में ख़्वाह-मख़ाह में
ग़ौस ख़ाह मख़ाह हैदराबादी
नज़्म
कोई सूरत ऐसी
सामने आ जा मगर धीमी ज़रा साँस की लौ
और सुलगा दे कोई बीते समय का संदल














