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ग़ज़ल
फ़ना बुलंदशहरी
ग़ज़ल
बहादुर शाह ज़फ़र
नज़्म
कोई 'आशिक़ किसी महबूबा से!
हम-सुख़न होंगे जो हम दोनों तो हर बात के बीच
अन-कही बात का मौहूम सा पर्दा होगा
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
जान सी शय बिक जाती है एक नज़र के बदले में
आगे मर्ज़ी गाहक की इन दामों तो सस्ती है











