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शेर
ये उड़ी उड़ी सी रंगत ये खुले खुले से गेसू
तिरी सुब्ह कह रही है तिरी रात का फ़साना
एहसान दानिश कांधलवी
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नज़्म
दोस्ती का हाथ
तुम्हें भी ज़िद है कि मश्क़-ए-सितम रहे जारी
हमें भी नाज़ कि जौर-ओ-जफ़ा के आदी हैं
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
वो लजाए मेरे सवाल पर कि उठा सके न झुका के सर
उड़ी ज़ुल्फ़ चेहरे पे इस तरह कि शबों के राज़ मचल गए
मजरूह सुल्तानपुरी
ग़ज़ल
छुपाते हैं बहुत वो गर्मी-ए-दिल को मगर मैं भी
गुल-ए-रुख़ पर उड़ी रंगत के छींटे देख लेता हूँ
मुनीर नियाज़ी
नज़्म
एक मकड़ा और मक्खी
उड़ती हुई आई हो ख़ुदा जाने कहाँ से
ठहरो जो मिरे घर में तो है इस में बुरा क्या














