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ग़ज़ल
है मुग़ालता भी अजीब शय वो न याद आएगा ता-ब-के
जो छुपा के अपने ही ज़ेहन में ये समझ लिया कि भुला दिया
आले रज़ा रज़ा
ग़ज़ल
दीवाने ख़त-ओ-ज़ुल्फ़ के सौदे की लहर में
क्या क्या न बके सुम्बुल-ओ-रैहाँ से उलझ कर
मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल
शेर
जिस नूर के बक्के को मह-ओ-ख़ुर ने न देखा
कम-बख़्त ये दिल लोटे है उस पर्दा-नशीं पर
जुरअत क़लंदर बख़्श
कुल्लियात
कहता हूँ हाल-ए-दिल तो कहे है कि मत बके
क्यों नईं तिरी तो बात मिरे दिल-नशीं नहीं








