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ग़ज़ल
इलाही ज़िंदगी यूँही मोहब्बत में गुज़र जाए
नमाज़-ए-फ़ज्र पढ़ कर ये दुआ करते थे हम दोनों
हसन अब्बासी
ग़ज़ल
रात भर चिल्ले वज़ीफ़े वो तहज्जुद और फज्र
मिल गया अब तो सिला ऐ मेरी माँ अच्छी तो हो
कफ़ील आज़र अमरोहवी
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ग़ज़ल
क्या जाने कहाँ जाने की जल्दी थी दम-ए-फ़ज्र
सूरज से ज़रा पहले ही बिस्तर से उठा मैं
दिलावर अली आज़र
हास्य
उठो कि अब नमाज़-ए-फ़ज़्र के लिए वुज़ू करें
कि रात तो गई गुज़र मज़ाक़ ही मज़ाक़ में
इनायत अली ख़ाँ
नज़्म
मोहब्बत क्या है
दिल की पाक शफ़्फ़ाफ़ ज़मीन पर
ये मोहब्बत अज़ान-ए-फ़ज्र के बाद उतरती हुई पाक सहर है
उमैननुज़ ज़हरा सय्यद
नज़्म
ठहरे हुए मौसम की एक नज़्म
तो उसे उठाना
कभी शाम के घोंसले से परिंदा फज्र से इबादत का चोग़ा पहाड़ों से
असग़र नदीम सय्यद
ग़ज़ल
हमारे मय-कदे में आख़िर-ए-शब का समाँ देखो
नमाज़-ए-फ़ज्र है और हैं नशे में धुत ख़ुदा और हम
फ़रहत एहसास
ग़ज़ल
ख़्वाब-गाहों से अज़ान-ए-फ़ज्र टकराती रही
दिन चढ़े तक ख़ामुशी मिम्बर पे चिल्लाती रही
ज़हीर सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
ज़ंजीर-ए-दर-ए-यार पे रहती हैं निगाहें
फज्र-ओ-ज़ुहर-ओ-अस्र या तारीकी-ए-शब हो










