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नज़्म
वक़्त
ये ज़ेहन में बनती और बिगड़ती हुई फ़ज़ाएँ
वो फ़िक्र में आए ज़लज़ले हों कि दिल की हलचल
जावेद अख़्तर
ग़ज़ल
तेरे ख़िराम-ए-नाज़ से आज वहाँ चमन खिले
फ़सलें बहार की जहाँ ख़ाक उड़ा के रह गईं
फ़िराक़ गोरखपुरी
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विषय
फ़ज़ा
फ़ज़ा शायरी
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रेख़्ता शब्दकोश
kyaa bataa.e.n
क्या बताएँ کیا بَتائیں
नाक़ाबिल-ए-बयान है, में बता नहीँ सकता, मुझ से इस बात की वज़ाहत नहीं हो सकती
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ग़ज़ल
दिल मुजस्सम शेर-ओ-नग़्मा वो सरापा रंग-ओ-बू
क्या फ़ज़ाएँ हैं कि जिन में हल हुआ जाता हूँ मैं
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
ये वादियाँ ये फ़ज़ाएँ बुला रही हैं तुम्हें
ख़मोशियों की सदाएँ बुला रही हैं तुम्हें
साहिर लुधियानवी
नज़्म
रूह-ए-अर्ज़ी आदम का इस्तिक़बाल करती है
ये गुम्बद-ए-अफ़्लाक ये ख़ामोश फ़ज़ाएँ
ये कोह ये सहरा ये समुंदर ये हवाएँ
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
धरती की सुलगती छाती से बेचैन शरारे पूछते हैं
बद-बख़्त फ़ज़ाएँ किस की हैं बर्बाद नशेमन किस के हैं
कुछ हम भी सुनें हम को भी सुना










