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नज़्म
शिकवा
ख़ूगर-ए-पैकर-ए-महसूस थी इंसाँ की नज़र
मानता फिर कोई अन-देखे ख़ुदा को क्यूँकर
अल्लामा इक़बाल
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ग़ज़ल
कारवाँ थक कर फ़ज़ा के पेच-ओ-ख़म में रह गया
मेहर ओ माह ओ मुश्तरी को हम-इनाँ समझा था मैं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
रात और रेल
एक रख़्शर-ए-बे-अनाँ की बर्क़-रफ़्तारी के साथ
ख़ंदक़ों को फाँदती टीलों से कतराती हुई
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
वाँ करम को उज़्र-ए-बारिश था इनाँ-गीर-ए-ख़िराम
गिर्ये से याँ पुम्बा-ए-बालिश कफ़-ए-सैलाब था
मिर्ज़ा ग़ालिब
उद्धरण
बादशाहों और मुतलक़-उल-अनान हुकमुरानों की मुस्तक़िल और दिल-पसंद सवारी दर-हक़ीक़त रिआ'या होती है।...
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
ग़ज़ल
खींच ले अव्वल ही से दिल की इनान-ए-इख़्तियार
तू ने गर ऐ आशिक़-ए-दिल-गीर फिर खींची तो क्या
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
लब बंद हों तो रौज़न-ए-सीना को क्या करूँ
थमता तो मुझ से नाला-ए-आतिश-इनाँ नहीं
मुफ़्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा
नज़्म
फिर वही कुंज-ए-क़फ़स
मेरे महबूब वतन तेरे मुक़द्दर के ख़ुदा
दस्त-ए-अग़्यार में क़िस्मत की इनाँ छोड़ गए
साहिर लुधियानवी
नज़्म
सफ़र नामा
मेरे हाथों में है सुब्हों की एनान-ए-गुलगूँ
मेरी आग़ोश में पलती है ख़ुदाई सारी












