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नज़्म
तज़ाद
यज़ीद मौसम-ए-इस्याँ का ला-'इलाज मरज़
हुसैन ख़ाक से ख़ाक-ए-शिफ़ा बनाता है
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
नज़्म
सानेहा
किस की नज़र पड़ेगी अब 'इस्याँ पे लुत्फ़ की
वो महरम-ए-नज़ाकत-ए-इस्याँ चला गया
असरार-उल-हक़ मजाज़
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kiyaa.n
कियाँ کِیاں
‘कय' का बहु., सम्राट्, ईरान में चार सम्राट् हुए हैं-कै काऊस, कैखुस्रौ, कैकुबाद, कैलोहास्प।।
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ग़ज़ल
ग़ुरूर-ए-लुत्फ़-ए-साक़ी नश्शा-ए-बे-बाकी-ए-मस्ताँ
नम-ए-दामान-ए-इस्याँ है तरावत मौज-ए-कौसर की
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
लिखा ये दावर-ए-महशर ने मेरी फ़र्द-ए-'इस्याँ पर
ये वो बंदा है जिस पर नाज़ करता है करम मेरा
चकबस्त बृज नारायण
ग़ज़ल
जब नहीं मस्तूरियों में भी गुनाहों से नजात
दिल खुले बंदों ग़रीक़-ए-बहर-ए-इसयाँ क्यूँ न हो
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
नींद आ गई थी मंज़िल-ए-इरफ़ाँ से गुज़र के
चौंके हैं हम अब सरहद-ए-इसयाँ से गुज़र के
अली जवाद ज़ैदी
ग़ज़ल
जब सर में हवा-ए-ताअत थी सरसब्ज़ शजर उम्मीद का था
जब सर-सर-ए-इस्याँ चलने लगी इस पेड़ ने फलना छोड़ दिया
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
हमारा तजरबा ये है कि ख़ुश होना मोहब्बत में
कभी मुश्किल नहीं होता कभी आसाँ नहीं होता
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
इलाही नहर-ए-रहमत बह रही है इस में डलवा दे
गुनहगारों के इस्याँ बाँध कर दामान-ए-महशर में
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
हाँ हाँ मिरे इस्याँ का पर्दा नहीं खुलने का
हाँ हाँ तिरी रहमत का है काम ख़ता-पोशी
बेदम शाह वारसी
ग़ज़ल
देखे जो दाग़ दामन-ए-इसयाँ पे बे-शुमार
मैं ने भी जोश-ए-गिर्या से तूफ़ाँ बपा किया
हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा
शेर
'नुशूर' आलूदा-ए-इस्याँ सही पर कौन बाक़ी है
ये बातें राज़ की हैं क़िब्ला-ए-आलम भी पीते हैं
नुशूर वाहिदी
ग़ज़ल
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
नज़्म
आहंग-ए-नौ
ये क़यामत के हवसनाक ग़ज़ब के ख़ूँ-ख़ार
इन के इस्याँ की न हद है न जराएम का शुमार
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
काम ये तेरा ही था रहमत हो ऐ अब्र-ए-करम
वर्ना जाए दाग़-ए-'इस्याँ मेरा दामाँ छोड़ कर












