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नज़्म
मादाम
नूर-ए-सरमाया से है रू-ए-तमद्दुन की जिला
हम जहाँ हैं वहाँ तहज़ीब नहीं पल सकती
साहिर लुधियानवी
नज़्म
आख़िरी लम्हा
इंसान वही है ताबिंदा उस राज़ से जिस का सीना है
औरों के लिए तो जीना ही ख़ुद अपने लिए भी जीना है
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
बहुत से लोगों को ग़म ने जिला के मार दिया
जो बच रहे थे उन्हें मय पिला के मार दिया
अब्दुल हमीद अदम
नज़्म
एक नज़्म कहीं से भी शुरूअ हो सकती है
नज़्म का भी एक घर होगा
किसी जिला-वतन का दिल या इंतिज़ार करती हुई आँखें
सरवत हुसैन
नज़्म
शाम-ए-अयादत
पर इस के ब'अद उस निगाह ने मुझे जिला लिया
निगाह-ए-यार तुझ से अपनी मंज़िलें मैं पाऊँगा
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
ख़फ़ा हो किस पे भंवें क्यूँ चढ़ी हैं ख़ैर तो है
ये आप तेग़ पे धर कर जिला किधर को चले












