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नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
जिस की पीरी में है मानिंद-ए-सहर रंग-ए-शबाब
कह रहा है मुझ से ऐ जूया-ए-असरार-ए-अज़ल
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हसन कूज़ा-गर (4)
हैं जूया किसी अज़्मत-ए-ना-रसा के
उन्हें क्या ख़बर कैसा आसेब-ए-मुबरम मेरे ग़ार सीने पे था
नून मीम राशिद
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नज़्म
मुस्लिम यूनिवर्सिटी अलीगढ़ से ख़िताब
कुश्ता-ए-मग़रिब निगार-ए-शर्क़ के अबरू भी देख
साज़-ए-बे-रंगी के जूया सोज़-ए-रंग-ओ-बू भी देख
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
ब-सैल-ए-अश्क लख़्त-ए-दिल है दामन-गीर मिज़्गाँ का
ग़रीक़-ए-बहर जूया-ए-ख़स-ओ-ख़ाशाक-ए-साहिल है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
फ़ित्ना-ए-अक़्ल के जूया मिरी दुनिया से गुज़र
मेरी दुनिया में मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं
जाँ निसार अख़्तर
ग़ज़ल
और किस वज़्अ के जूया हैं उरूसान-ए-बहिश्त
हैं कफ़न सुर्ख़ शहीदों का सँवरना है यही
मौलाना मोहम्मद अली जौहर
नज़्म
अफ़्साना-ए-शहर
शहर के शहर का अफ़्साना वो रूहें जो सर-ए-पुल के सिवा
और कहीं वस्ल की जूया ही नहीं
नून मीम राशिद
ग़ज़ल
आराम-तलब होने का गुमाँ जूया पे तिरे ला-हौल वला
तब पाँव को तोड़े बैठा हूँ जब दश्त-ओ-जबल को छान लिया
शाद अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
मता-ए-हक़-अक़ीदा एक सज्दे में चुरा लाया
ख़िरद जूया थी किस दहलीज़ पर किस दर पे रक्खी है
अब्दुल अहद साज़
ग़ज़ल
तिरी और ज़िंदगी है मिरी और ज़िंदगी है
मैं बुलंदियों का जूया तो असीर-ए-आशियाना












