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शेर
ऐ 'ज़ौक़' देख दुख़्तर-ए-रज़ को न मुँह लगा
छुटती नहीं है मुँह से ये काफ़र लगी हुई
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
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ग़ज़ल
क़द्र कुछ भी मिरे दिल की बुत-ए-काफ़िर ने न की
ज़ुल्फ़-ए-पेचाँ से जो उलझा तो मिरे सर मारा
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
यार 'क़मर' की बातों का क्या उस की एक ही रट
लिखता है बस नाम तिरा वो काफ़र-वाफ़र क्या
क़मर सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
तुम जिन्हें कहते हो काफ़र उन्हें आ कर देखो
कैसे करते हैं ये इंसान की ख़िदमत लिखना
फ़हमीदा मुसर्रत अहमद
नज़्म
ख़ंजर तलाश करता है
दुआ असीरी की करता है साहब-ए-क़ुरआँ
मफ़र ग़ुलामी से काफ़र तलाश करता है
बेबाक भोजपुरी
ग़ज़ल
कार-ए-दीं उस बुत के हाथों हाए अबतर हो गया
जिस मुसलमाँ ने उसे देखा वो काफ़र हो गया













