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ग़ज़ल
अक़्ल-ओ-शुऊर भी हैं क्या उक़्दा-ए-राज़-ए-दहर हैं
रह गए और उलझ के हम सई-ए-कशूद-ए-राज़ में
जिगर बरेलवी
ग़ज़ल
ज़हीर देहलवी
ग़ज़ल
जहाँ कशूद-ए-नवा पर ख़िज़ाँ के पहरे हैं
वहीं बहार-ए-ग़ज़ल-ख़्वाँ है देखिए क्या हो
सय्यद आबिद अली आबिद
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mash.huud
मशहूद مَشْہُود
जो उपस्थित किया गया हो, जिस पर गवाही दी गयी हो, ध्येय, ज़ाहिर, दिखाई, जो सब के सामने उपस्थित या ज़ाहिर हो, देखा गया
nau-kashiid
नौ-कशीद نَو کَشِید
(शाब्दिक) नई भबका की हुई, नया खींचा हुआ (प्रायः) नई खींची हुई, नई-नई टपकाई हुई, नई बूँद-बूँद टपकाई हुई (शराब के लिए प्रयुक्त)
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ग़ज़ल
डरे क्यूँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उस की गर्दन पर
वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
शिकवा
फिर ये आज़ुर्दगी-ए-ग़ैर सबब क्या मा'नी
अपने शैदाओं पे ये चश्म-ए-ग़ज़ब क्या मा'नी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
ख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ाली
गुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लाली
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
लगने न दे बस हो तो उस के गौहर-ए-गोश को बाले तक
उस को फ़लक चश्म-ए-मह-ओ-ख़ुर की पुतली का तारा जाने है
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
आप दरिया हैं तो फिर इस वक़्त हम ख़तरे में हैं
आप कश्ती हैं तो हम को पार होना चाहिए
मुनव्वर राना
नज़्म
आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो
चश्म-ए-नम जान-ए-शोरीदा काफ़ी नहीं
तोहमत-ए-इश्क़-ए-पोशीदा काफ़ी नहीं














