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ग़ज़ल
दिल मिरे दिल मुझे भी तुम अपने ख़वास में रखो
याराँ तुम्हारे बाब में मैं ही न मो'तबर रहा
जौन एलिया
ग़ज़ल
किसे हर्फ़-ए-हक़ सुनाऊँ कि यहाँ तो उस को सुनना
न ख़वास चाहते हैं न अवाम चाहते हैं
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
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नज़्म
बादा-ए-इश्क़ से सरशार गुरु-नानक थे
अब्र-ए-नैसाँ का ख़वास उन की नसीहत में था
लब-ए-शीरीं से गुहर-बार गुरु-नानक थे
श्याम सुंदर लाल बर्क़
नज़्म
उर्दू नज़्म
दिल-ए-ख़वास है रूह-ए-अवाम है उर्दू
ज़बाँ नहीं है मुकम्मल निज़ाम है उर्दू
ज़किया सुल्ताना नय्यर
नज़्म
इन्नी-कुंतो-मिनज़्ज़ालेमीन
आजिज़-ओ-मिस्कीन बैठे हैं
सभी ख़वास अपनी बे-मुरव्वत ख़ुद-नुमाई में
सत्यपाल आनंद
नअत
ज़र्रा-ओ-ख़ुर्शीद क्या मरकज़-ओ-तम्हीद क्या
जान-ए-ख़वास-ओ-‘अवाम लुत्फ़-ए-मुजस्सम हो तुम
बहज़ाद लखनवी
ग़ज़ल
पैदा किया है क़ल्ब ने सीमाब का ख़वास
हासिल न क्यों हो माही-ए-बे-आब का ख़वास











