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ग़ज़ल
नूह नारवी
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ग़ज़ल
हम कि दुख ओढ़ के ख़ल्वत में पड़े रहते हैं
हम ने बाज़ार में ज़ख़्मों की नुमाइश नहीं की
अहमद फ़राज़
नज़्म
एक आरज़ू
हो हाथ का सिरहाना सब्ज़े का हो बिछौना
शरमाए जिस से जल्वत ख़ल्वत में वो अदा हो
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
औरत
ता-ब-कै गिर्द तिरे वहम ओ तअ'य्युन का हिसार
कौंद कर मज्लिस-ए-ख़ल्वत से निकलना है तुझे
कैफ़ी आज़मी
ग़ज़ल
इसी काएनात में ऐ 'जिगर' कोई इंक़लाब उठेगा फिर
कि बुलंद हो के भी आदमी अभी ख़्वाहिशों का ग़ुलाम है
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
वो सुब्ह कभी तो आएगी
जब धरती करवट बदलेगी जब क़ैद से क़ैदी छूटेंगे
जब पाप घरौंदे फूटेंगे जब ज़ुल्म के बंधन टूटेंगे









