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नज़्म
इबलीस की मजलिस-ए-शूरा
साकिनान-ए-अर्श-ए-आज़म की तमन्नाओं का ख़ूँ
इस की बर्बादी पे आज आमादा है वो कारसाज़
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हिण्डोला
यही ज़मीं यही दरिया पहाड़ जंगल बाग़
यही हवाएँ यही सुब्ह-ओ-शाम सूरज चाँद
फ़िराक़ गोरखपुरी
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ग़ज़ल
अता की जब कि ख़ुद पीर-ए-मुग़ाँ ने पी भी ले ज़ाहिद
ये कैसा सोचना है तुझ पे क्यूँ इल्ज़ाम आएगा
शाद अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
अब तिरी यादों के निश्तर भी हुए जाते हैं कुंद
हम को कितने रोज़ अपने ज़ख़्म छीले हो गए
शाहिद कबीर
नज़्म
कॉफ़ी-हाउस
उर्दू-अदब में ढाई हैं शायर 'मीर' ओ 'ग़ालिब' आधा 'जोश'
या इक-आध किसी का मिस्रा या 'इक़बाल' के चंद अशआर
हबीब जालिब
नज़्म
शाइर-ए-मशरिक़ की अर्ज़-दाश्त
इस रज़्म-ए-ख़ैर-ओ-शर में हुआ कौन सुरख़-रू
ज़र्ब-ए-कलीम कुंद है फ़िरऔन सुर्ख़-रू
ज़हीर सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
हो नहीं पाती कोई आसान सी मुश्किल भी सहल
कुंद सा हर नाख़ुन-ए-तदबीर है तेरे बग़ैर
आनंद नारायण मुल्ला
ग़ज़ल
नसब सरकार ने जिस को किया ख़ुद अपने हाथों से
वक़ार-ए-अज़्मत-ए-काबा वो पत्थर याद आता है












