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हरी चंद अख़्तर

1900 - 1958 | लाहौर, पाकिस्तान

प्रतिष्ठित पत्रकार और शायर

प्रतिष्ठित पत्रकार और शायर

ग़ज़ल 24

शेर 20

हमें भी पड़ा है दोस्तों से काम कुछ यानी

हमारे दोस्तों के बेवफ़ा होने का वक़्त आया

I need a favour from my friends so now

the time has come for them to disavow

अगर तेरी ख़ुशी है तेरे बंदों की मसर्रत में

तो मेरे ख़ुदा तेरी ख़ुशी से कुछ नहीं होता

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मिलेगी शैख़ को जन्नत हमें दोज़ख़ अता होगा

बस इतनी बात है जिस बात पर महशर बपा होगा

the priest to paradise, and I to hell arraigned

will, on such a trifle, be judgement day ordained?

मुझ को देखा फूट के रोया

अब समझा समझाने वाला

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अब आप गए हैं तो आता नहीं है याद

वर्ना हमें कुछ आप से कहना ज़रूर था

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क़िस्सा 14

तंज़-ओ-मज़ाह 1

 

पुस्तकें 2

हाली पानी पती

 

 

Kufr-o-Iman

 

1960

 

चित्र शायरी 1

अगर तेरी ख़ुशी है तेरे बंदों की मसर्रत में तो ऐ मेरे ख़ुदा तेरी ख़ुशी से कुछ नहीं होता

 

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अज्ञात

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Vocal Title: Kis Ne Zarron Ko Uthaya کس نے ذروں کو اٹھایا Lyrics: Pandit Harichand Akhtar

अज्ञात

मिलेगी शैख़ को जन्नत, हमें दोज़ख़ अता होगा

राहील फ़ारूक़

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