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ग़ज़ल
ये बूँदें पहली बारिश की, ये सोंधी ख़ुशबू माटी की
इक कोयल बाग़ में कूकी है, आवाज़ यहाँ तक आई है
अज़ीज़ नबील
ग़ज़ल
सरापा हुस्न-ए-समधन गोया गुलशन की कियारी है
परी भी अब तो बाज़ी हुस्न में समधन से मारी है
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
फ़ना
उम्दों के तन को ताँबे के संदूक़ में धरा
मुफ़लिस का तन पड़ा रहा माटी-उपर पड़ा
नज़ीर अकबराबादी
शेर
ये बूँदें पहली बारिश की ये सोंधी ख़ुशबू माटी की
इक कोयल बाग़ में कूकी है आवाज़ यहाँ तक आई है













