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नज़्म
रामायण का एक सीन
रो कर कहा ख़मोश खड़े क्यूँ हो मेरी जाँ
मैं जानती हूँ जिस लिए आए हो तुम यहाँ
चकबस्त बृज नारायण
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नज़्म
रिश्वत
तोंद वालों की तो हो आईना-दारी वाह वा
और हम भूखों के सर पर चाँद-मारी वाह वा
जोश मलीहाबादी
नज़्म
शाम-ए-अयादत
मिरी फ़सुर्दा और बुझी हुई जबीं को छू लिया
ये किस निगाह की किरन ने साज़-ए-जाँ लिए हुए
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
मिरी रूह में जो उतर सकें वो मोहब्बतें मुझे चाहिएँ
जो सराब हों न अज़ाब हों वो रिफाक़तें मुझे चाहिएँ
ऐतबार साजिद
नज़्म
क़हत-ए-बंगाल
इफ़्लास की मारी हुई मख़्लूक़ सर-ए-राह
बे-गोर-ओ-कफ़न ख़ाक-ब-सर देख रहा हूँ
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
सरापा हुस्न-ए-समधन गोया गुलशन की कियारी है
परी भी अब तो बाज़ी हुस्न में समधन से मारी है










