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नज़्म
फ़रमान-ए-ख़ुदा
मैं ना-ख़ुश ओ बे-ज़ार हूँ मरमर की सिलों से
मेरे लिए मिट्टी का हरम और बना दो
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
उमीद
वो सुब्ह कभी तो आएगी
जिस सुब्ह की ख़ातिर जुग जुग से हम सब मरमर के जीते हैं
साहिर लुधियानवी
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नज़्म
इक शहंशाह ने बनवा के....
जिस के परवानों में मुफ़्लिस भी हैं ज़रदार भी हैं
संग-ए-मरमर में समाए हुए ख़्वाबों की क़सम
शकील बदायूनी
नज़्म
पत्थर
उस के मरमर में सियह ख़ून झलक जाता है
एक इंसाफ़ का पत्थर भी तो होता है मगर
अहमद नदीम क़ासमी
ग़ज़ल
जिस्म दमकता, ज़ुल्फ़ घनेरी, रंगीं लब, आँखें जादू
संग-ए-मरमर, ऊदा बादल, सुर्ख़ शफ़क़, हैराँ आहू
जावेद अख़्तर
नज़्म
रात सुनसान है
'कीट्स' की नज़्म 'अरस्तू' के हकीमाना क़ौल
संग-मरमर की इमारत की तरह साकित हैं
मुस्तफ़ा ज़ैदी
नज़्म
बरसात की बहारें
कितने उठे हैं मरमर कितने उकस रहे हैं
वो दुख में फँस रहे हैं और लोग हँस रहे हैं













