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नज़्म
फ़रमान-ए-ख़ुदा
मैं ना-ख़ुश ओ बे-ज़ार हूँ मरमर की सिलों से
मेरे लिए मिट्टी का हरम और बना दो
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
उमीद
वो सुब्ह कभी तो आएगी
जिस सुब्ह की ख़ातिर जुग जुग से हम सब मरमर के जीते हैं
साहिर लुधियानवी
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नज़्म
इक शहंशाह ने बनवा के....
जिस के परवानों में मुफ़्लिस भी हैं ज़रदार भी हैं
संग-ए-मरमर में समाए हुए ख़्वाबों की क़सम
शकील बदायूनी
नज़्म
पत्थर
इक वो पत्थर है जो कहलाता है तहज़ीब-ए-सफ़ेद
उस के मरमर में सियह ख़ून झलक जाता है
अहमद नदीम क़ासमी
ग़ज़ल
जिस्म दमकता, ज़ुल्फ़ घनेरी, रंगीं लब, आँखें जादू
संग-ए-मरमर, ऊदा बादल, सुर्ख़ शफ़क़, हैराँ आहू
जावेद अख़्तर
नज़्म
रात सुनसान है
संग-मरमर की इमारत की तरह साकित हैं
तू ही कुछ बात कर ऐ मेरे धड़कते हुए दिल
मुस्तफ़ा ज़ैदी
नज़्म
बरसात की बहारें
कितने उठे हैं मरमर कितने उकस रहे हैं
वो दुख में फँस रहे हैं और लोग हँस रहे हैं
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
यादें
हम ने इस अहमक़ को आख़िर इसी तज़ब्ज़ुब में छोड़ा
और निकाली राह मफ़र की इस आबाद ख़राबे में














